देहरी के पार, कड़ी - 28
मंगलवार, 16 अप्रैल, 2019.
सुबह के 11 बज चुके थे. एएसएल (Assistant Secretary Labour) के दफ्तर में आज का माहौल पिछली पेशी से भी ज्यादा तनावपूर्ण था. करीब सवा सौ मजदूर. दफ्तर के अहाते में खड़े थे. वकील चव्हाण, प्रशांत बाबू , प्रिया, और यूनियन के अध्यक्ष व सचिव एएसएल के इजलास में सुनवाई शुरू होने का इन्तजार कर रहे थे. कंपनी की टीम, उनका वकील और उसके सहायक अभी तक नहीं आए थे और असिस्टेंट सेक्रेटरी भी अभी अपने चैंबर में थे.
प्रिया कल रात आकाश से कोटा के अपडेट लेती रही थी, आज थोड़े कम उत्साह में थी. लेकिन उसकी आँखों में जिद और संकल्प वैसे ही थे. घर की देहरी लांघने के बाद के संघर्ष ने उसे अनेक नए पाठ सिखाए थे. वह जानने लगी थी कि संघर्ष में साथ और एकता जरूरी चीजें हैं. उसके संघर्ष में लोगों ने उसका साथ दिया था क्योंकि वे एक जैसे लोग थे; उनके संघर्ष एक थे. आज उसे मजदूरों की बड़ी एकता में अपना योगदान करना था. यही एकता उन्हें मजबूत और भयमुक्त बनाती थी. आकाश कल रात कोटा पहुँच गया था और उसने बताया था कि वह गाड़ी 'स्थानीय' नहीं थी. आकाश की उपस्थिति और जानकारियों से मयंक अब थोड़ा राहत महसूस कर रहा था.
कंपनी की टीम अपने वकील के साथ सवा ग्यारह के बाद इजलास में दाखिल हुई. उन्हें देख कर रीडर ने एएसएल को सूचना दी. दस मिनट बाद वह इजलास में था.
जैसे ही कार्यवाही शुरू हुई, एएसएल ने कड़क लहजे में पूछा, "मिस्टर भट्ट, पिछली पेशी पर हर्जाने की शर्त के साथ आपको आज शपथ पत्र (Affidavits) और उनकी कॉपियाँ यूनियन को देनी थी. क्या वे तैयार हैं?"
प्रबंधन के वकील, मनोज भट्ट ने एक भारी फ़ाइल मेज पर रखी, "जी हुज़ूर, लेकिन कुछ तकनीकी कारणों से हम केवल मुख्य डायरेक्टर का ही शपथ पत्र तैयार कर पाए हैं. बाकी दो के लिए हमें थोड़ा और समय चाहिए."
वकील चव्हाण तुरंत अपनी जगह से खड़े हुए, "सर! यह साफ़ तौर पर 'डिले टैक्टिक्स' है. 14 मई की डेडलाइन नजदीक है और ये जानबूझकर मामले को खींच रहे हैं. पिछली बार का 10 हजार रुपये का हर्जाना भी इन्होंने अदा नहीं किया है."
एएसएल ने जीएम की ओर देखा, जो पसीना पोंछ रहे थे. "मिस्टर जीएम, कानून किसी की प्रतीक्षा नहीं करता. आप क्लोजर का आवेदन लेकर आए हैं. साढ़े तीन सौ से अधिक कर्मचारियों की रोजी-रोटी दाँव है. मुझे 60 दिन पूरे होने से पहले अपने फैसले की कॉपी आपके हाथ में देनी है. आज 32वाँ दिन है मेरे पास सुनवाई के लिए 25 दिन भी नहीं बचे हैं. मुझे निर्णय देना है. मैं ढाई बजे फिर बैठूंगा. तब तक सभी गवाहों के शपथपत्र यहाँ रिकॉर्ड पर होने चाहिए और उनकी कॉपियाँ चव्हाण साहब के पास. हर्जाना अदा किया हुआ होना चाहिए.”
“जी", एएसएल की बात को अब तक चुपचाप सुन रहा प्रबंधन का वकील बोला. “हम ढाई बजे यहाँ होंगे हुजूर. तब हम जो भी शपथ पत्र हमें पेश करने हैं पेश कर देंगे.”
प्रबंधन की टीम इतना कहकर दफ्तर से बाहर निकल आई.
“चव्हाण सर.” प्रिया बोली. “अब आज केवल शपथ पत्र ही आएंगे. जिरह के लिए संभवतः शुक्रवार की पेशी दी जाएगी. आज मेरा कोई काम नहीं है. अभी 12 नहीं बजे हैं. मैं आधे घंटे में अपने ऑफिस पहुँच जाउंगी. मैं आज की छुट्टी बचा सकती हूँ?”
“हाँ, तुम जा सकती हो. आज शपथ पत्र आ जाएंगे. तुम अपने ऑफिस से निकलो तो मेरे ऑफिस होते हुए घर जाना. मैं वहाँ तुम्हें शपथ पत्रों की प्रतियाँ दे दूंगा. तुम उस पर अपनी रिसर्च शुरू कर सकती हो.”
“जी सर, मैं शाम में आपके ऑफिस आती हूँ.” इतना कहकर प्रिया तेजी से वहाँ से निकल गई.
...
अपने ऑफिस से निकलकर रात साढ़े आठ बजे प्रिया चव्हाण साहब के ऑफिस पहुँची. चव्हाण साहब के चैंबर में कोई और मुवक्किल बैठा था. प्रशांत बाबू बाहर उनके वेटिंग रूम में मिल गए. प्रिया ने उनसे पूछ लिया, “ढाई बजे क्या रहा?”
“ज्यादा कुछ नहीं, उन्होंने तीन शपथ पत्र और कुछ दस्तावेज पेश किए हैं. दस हजार रुपए हर्जे के अदा किए हैं. चव्हाण साहब ने तुम्हारे लिए उनकी कॉपियाँ करवा दी हैं. तुम ले लेना जिससे तुम उनकी खोजबीन कर सको.” प्रशांत बाबू ने बताया.
“और हाँ, पेशी होने के बाद हम लोग बाहर निकले तो प्रबंधन के वकील का जूनियर बाहर ही खड़ा था. उसने बताया कि जीएम साहब और वकील भट्ट कैंटीन में ही बैठे हैं, आपसे बात करना चाहते हैं. हम कैंटीन में गए. वहाँ उनसे बात हुई.”
“क्या कुछ पॉजिटिव बात हुई?”
प्रशांत बाबू मुस्कुराते हुए बताने लगे. “भट्ट ने मुझे कहा कि, “प्रशांत बाबू, क्यों न हम इस मामले को बाहर ही सुलझा लें? क्लोजर तो होकर रहेगा, लेकिन अगर आप और आपके वकील साहब मान जाएँ, तो हम मजदूरों के मुआवजे में थोड़ी बढ़ोतरी कर सकते हैं. आखिर कब तक ये लोग भूखे पेट पिकेटिंग करेंगे?"
“मैंने उनसे पूछा था कि, ‘यदि मजदूर क्लोजर को मान लें तो वे कितना मुआवजा और दे सकते हैं?’ तो वह बता रहा था कि वे सामान्य छंटनी के मुआवजे से दुगना दे सकते हैं.”
“फिर आपने क्या कहा?” प्रिया ने पूछा.
“मैंने कहा, ‘एक तो क्लोजर को मानने का फैसला हम नहीं बल्कि मजदूर उनकी आमसभा में लेंगे. दूसरा यह कि मुश्किल है कि मजदूर इतने मुआवजे पर क्लोजर को मान ले. हमें मजदूरों की आमसभा में उनकी राय लेनी पड़ेगी.’ मेरे इतना कहने पर वे कहने लगे ‘आप अगली पेशी के पहले आमसभा करके हमें बता सकते हैं’ इस पर मैंने उसे कह दिया कि हम कोशिश करेंगे.”
चव्हाण साहब अपने क्लाइंट से फ्री हो लिए थे वे दोनों उनके पास जा बैठे. उन्होंने प्रिया को शपथ पत्रों और दस्तावेजों की प्रतियाँ दीं. प्रिया ने उनसे पूछ लिया, “सर, उन्होंने प्रशांत जी को प्रस्ताव दिया है उस बारे में आपकी क्या राय है?”
“कुछ नहीं, वे फिलहाल हमारा ध्यान क्लोजर की सुनवाई से भटकाना चाहते हैं. लेकिन हम समझौते का रास्ता भी बंद नहीं करेंगे. इसलिए हम अपना पूरा ध्यान सुनवाई पर रखते हुए उनसे बात करते रहेंगे.”
“और हाँ प्रिया, चव्हाण साहब ने मुस्कुराते हुए कहा, “वकील भट्ट तुम्हारे लिए पूछ रहा था कि, ‘आपकी नयी असिस्टेंट दिखाई नहीं दी.’ मैंने उसे कह दिया कि उसे किसी काम से हाईकोर्ट भेजा है.”
इस पर प्रिया को भी हँसी छूट गई. वह कहने लगी, “आपने तो मुझे सचमुच का वकील बना दिया उनके लिए.”
“और मैं क्या कहता?”
“ठीक है सर, मैं शपथ पत्र और दस्तावेज ले जा रही हूँ. इन्हें डिजिटाइज करके अपना काम शुरू करती हूँ. शुक्रवार में केवल दो दिन बीच में हैं. मुझे तेजी से काम करना होगा. कोटा की मुझे अब फिक्र नहीं है, आकाश ने वहाँ संभाल लिया है. अब मेरा पूरा ध्यान इन कागजों में छिपे उन झूठों को पकड़ने पर है जिनके सहारे वे साढ़े तीन सौ से अधिक परिवारों का भविष्य लील जाना चाहते हैं."
... क्रमशः